
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को पूर्वी दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन में दशहरा के अवसर पर रावण दहन समारोह में शामिल हुए। इस दौरान प्रधानमंत्री ने तीर चलाकर रावण के पुतले का दहन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि रामराज्य एक ऐसी शासन-व्यवस्था का प्रतीक है जो भेदभाव से मुक्त हो—एक ऐसा समाज जहाँ न्याय हो और सभी को समान अवसर मिलें। ऐसी व्यवस्था में, सत्ता का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि लोगों का कल्याण सुनिश्चित करना होता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि गरीबों और वंचितों की सेवा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। भगवान राम का जीवन हमें एक गहरा सबक देता है: चाहे संकट कितना भी बड़ा हो या चुनौती कितनी भी कठिन, हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमें अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए, अपने संसाधनों पर भरोसा रखना चाहिए, अपने संकल्प को ताकत में बदलना चाहिए और अपनी कड़ी मेहनत से समाधान खोजना चाहिए… आज हमें भी इसी मंत्र को अपनाकर आगे बढ़ना है। हमने अपने सामने ‘विकसित भारत’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का लक्ष्य रखा है…”
आत्म-सम्मान की भावना राष्ट्र की प्रगति का आधार
दिल्ली में प्रधानमंत्री ने कहा कि कोई भी राष्ट्र तभी प्रगति करता है जब उसमें आत्म-सम्मान की भावना हो, और इस आत्म-सम्मान को जगाने में उसकी विरासत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही कारण है कि आज हमारा देश अपनी विरासत और पहचान को सहेजने के लिए समर्पित है। सदियों तक हमारी धरोहरों को लूटा गया और विदेशों में ले जाया गया; लेकिन आज हम उन्हें वापस ला रहे हैं। पिछले 12 वर्षों में, 650 से अधिक प्राचीन कलाकृतियां और मूर्तियां भारत वापस लाई गई हैं। भारत अपने सांस्कृतिक केंद्रों के लिए एक नई वैश्विक पहचान बना रहा है। हाल के वर्षों में, हमारे कई स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। पिछले साल, यूनेस्को ने दिवाली को भी मानवता की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में मान्यता दी। यह करोड़ों भारतीयों की सामूहिक इच्छाशक्ति का परिणाम है। हमें इसी लगन के साथ अपना काम जारी रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विजयादशमी जीत का त्योहार है—यह विजय का उत्सव है। यह हमें यह विश्वास रखने का साहस देता है कि चाहे विरोधी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि हम सत्य और मानवता के पक्ष में खड़े हैं, तो अंततः जीत हमारी ही होगी। विजयादशमी की यह भावना हमेशा से ही भारत की मूल चेतना का केंद्र रही है…”



