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US मिडटर्म इलेक्शन में करारी हार ट्रंप की मनमानी का नतीजा, क्या राष्ट्रपति बदलेंगे अपनी नीति?

Trump US midterm rout : अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को हुए मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत गंवाना पड़ा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस और गवर्नरों के प्रमुख पदों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। चुनाव के नतीजों को ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी नागरिकों नाराजगी मानी जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि ये मध्यावधि चुनाव परिणाम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और उनके व्यवहार पर एक तरह का “जनमत संग्रह” हैं।परिणामों से पता चलता है कि अमेरिकी लोग ट्रम्प के काम करने के तरीके में बदलाव चाहते हैं, जिससे उनके कार्यकाल के बचे हुए दो वर्षों में उनका रुख अधिक व्यावहारिक हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन नतीजों का असर अमेरिका के बाहर भी देखने को मिलेगा, जो वैश्विक राजनीति और भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर सकता है। इन चुनावों ने अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की बढ़ती भागीदारी को भी उजागर किया है, जिसमें कई उम्मीदवार जीते हैं तो कुछ को हार का सामना करना पड़ा है।

ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को टेक्सास, जॉर्जिया और आयोवा जैसे अपने मजबूत गढ़ों में करारी हार का सामना करना पड़ा, जहां उसे डेमोक्रेट्स के हाथों गवर्नरों के पद गंवाने पड़े। ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ (GOP) को टेक्सास, मेन, साउथ कैरोलिना, नॉर्थ कैरोलिना, कैनसस और आयोवा में सीनेट चुनावों में भी बुरी तरह हार मिली। इन जगहों पर ट्रम्प ने एक सीधा-सा संदेश देकर प्रचार किया था—उन्होंने मतदाताओं से कहा कि वे ऐसा मान लें कि वे (ट्रम्प) खुद चुनावी मैदान में हैं।

रिपब्लिकन पार्टी को मध्यावधि चुनाव में हुए इन व्यापक नुकसानों का कारण ट्रम्प की नीतियों के प्रति लोगों का गुस्सा बताया जा रहा है, जिसमें ईरान के खिलाफ छेड़ा गया संघर्ष भी शामिल है। माना जा रहा है कि इन नीतियों की वजह से जीवन-यापन का खर्च बढ़ गया है और डीजल की कीमतें भी काफी ऊंची हो गई हैं। 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों के बाद से ही अमेरिका और ईरान के बीच टकराव चल रहा है, जिसके वैश्विक स्तर पर भी असर पड़े हैं।

इन मध्यावधि चुनावों को राष्ट्रपति ट्रम्प के कार्यकाल की पहली असली परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। उनका यह कार्यकाल युद्धों, टैरिफ (शुल्क) और घरेलू मोर्चे पर बढ़ती गैस की कीमतों तथा महंगाई के दबाव से घिरा रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन चुनावों में मिली हार के बाद अगले दो साल तक ट्रंप को मनमानी करने से रोकेगा। उनकी पार्टी और उनका प्रशासन उन्हें अपनी नीतियां बदलने की सलाह देंगे। जिससे ईरान के साथ तनाव कम होने की भी उम्मीद है। वहीं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के खुलने का रास्ता भी साफ होगा।

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